जनता जनार्दन
 
'इनडोर गेम' में कैद बच्चों का बचपन
 
May 19, 2011
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द्वारा
Samiksha
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हमारे जिंदगी जीने के ढंग में सामाजिक बदलाव कुछ इस तरह से हुए हैं कि बच्चों में जिंदगी जीने का नजरिया ही बदलता जा रहा है, शायद आज के बच्चों को ये याद नहीं कि उन्होनें बारिश में भीगने या कागज की कश्ती चलाने का मजा लिया भी है या नहीं ? दरअसल जिंदगी को लेकर हमारा नजरिया इतना डरावना है कि उसमें शरारतों और संवेदनाओं के रंग उभर ही नहीं पाते।
हम बच्चों को प्ले स्टेशन, कंप्यूटर गेम और आईपॉड तो खेलने देंगे, पर मैदानों, खेत-खलिहानों या नदियों के किनारे खेलने की इजाजत कतई नहीं देते।
संवेदनाओं के रंग उभरने से पहले ही बच्चों के मन में डर की भावना भर दी जाती है।
इन दिनों पैरेंट्स अपने बच्चों के प्रति जरूरत से ज्यादा प्रोटेक्टिव हो गए हैं और बच्चों को बड़ों के साथ के बिना खेलने के लिए भी नहीं जाने दिया जाता।
वैसे 70 फीसदी वयस्क अपने बचपन में नदियों, मैदानों और खेत-खलिहानों में खेल-कूद के रोमांच का खूब मजा उठा चुके हैं, यानी उन दिनों बच्चों के पैरेंट्स ओवर प्रोटेक्टिव नहीं होते थे। आज की अपेछा उन्हें डराते नहीं थे और खुद भी इतना नहीं डरते थे।
जबकि आज के अधिकाशं बच्चों में से बहुत कम ही आउटडोर गेम का जी भर के आनंद उठा सकते हैं।
आज के बच्चों के पास सभी तरह की सुख-सुविधा भले ही हो, जैसे मोबाइल फोन हों, प्ले स्टेशन, कप्यूटर गेम और आईपॉड हों, लेकिन वे खुले मैदानों, नदियों और सार्वजनिक स्थानों में खुलकर जीने का आनंद नहीं जानते.. इसकी वजह यही है कि उनके माता-पिता अपने बच्चे की सुरक्षा के प्रति भयभीत रहते हैं।
इससे से बच्चों का विकास भी मंद पड़ सकता है। इसलिए बच्चों को उनके बचपन को पुरी तरह से जीने देने चाहिया। बच्चे को कहें, "डरो मत! डर को फलाँगो, जीत तुम्हारी होगी।"
   मैंने पढ़ा और मैं सेवा के नियमों से सहमत हूँ।
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दिनॉक: May 24, 2011
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पोस्ट बाय : Samiksha
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